Zee Jaankari: राफेल पूजा पर हिंदू विरोधी गैंग के 'तमाशे' का विश्लेषण

Zee Jaankari: राफेल पूजा पर हिंदू विरोधी गैंग के 'तमाशे' का विश्लेषण

परमाणु बम के जनक माने जाने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक Robert Oppenheimer के नेतृत्व में 16 जुलाई 1945 को अमेरिका ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था. इस न्यूक्लियर टेस्ट के बाद Oppenheimer ने भगवद गीता के एक श्लोक के ज़रिए परमाणु बम की ताकत को परिभाषित किया था. जिसमें उन्होंने कहा कि.. भगवान कृष्ण जब अर्जुन को उनके कर्तव्यों की याद दिलाते हैं तो वो एक विराट रूप धारण कर लेते हैं और कहते हैं कि अब मैं ही मृत्यु हूं और संसारों का संहार करने वाला हूं . आज आपको भी हिंदू धर्म से प्रभावित Robert Oppenheimer द्वारा.. 74 वर्ष पहले कहे गए ये शब्द सुनने चाहिए.

यानी दुनिया के सबसे शक्तिशाली हथियार का निर्माण करने वाले वैज्ञानिक को भी कर्म करते रहने का संदेश हिंदू धर्म से मिला और उन्होंने भगवद गीता के श्लोक को अपने सबसे बड़े अविष्कार का आधार बना लिया . जबकि हमारे देश में रहने वाले कुछ लोगों को हिंदू संस्कृति की निशानियों से एलर्जी है और वो इसे अंधविश्वास और सांप्रदायिकता से जोड़ लेते हैं.

रफाल की शस्त्र पूजा का विरोध करने वाली कांग्रेस ने कुछ दिनों पहले ही...अपने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद की ट्रेनिंग देने का फैसला किया था . जबकि आज वो देश की सेना के सम्मान और शक्ति से जुड़े रफाल लड़ाकू विमान की शस्त्र पूजा को सांप्रदायिकता से जोड़ रही है . और इसमें कांग्रेस का साथ..अंग्रेज़ी बोलने वाले बुद्धीजीवी, टुकड़े-टुकड़े गैंग और अवार्ड वापसी गैंग के सदस्य भी दे रहे हैं .

इसलिए अब कांग्रेस के ही कई नेता कह रहे हैं कि पार्टी को आत्मविश्लेषण की ज़रूरत है. यानी दुनिया के सबसे शक्तिशाली हथियार का निर्माण करने वाले वैज्ञानिक को भी कर्म करते रहने का संदेश हिंदू धर्म से मिला और उन्होंने भगवद गीता के श्लोक को अपने सबसे बड़े अविष्कार का आधार बना लिया .

जबकि हमारे देश में रहने वाले कुछ लोगों को हिंदू संस्कृति की निशानियों से एलर्जी है और वो इसे अंधविश्वास और सांप्रदायिकता से जोड़ लेते हैं. ये बहुत दुर्भाग्य की बात है कि भारत के सांस्कृति चिन्हों से अब इन लोगों को परेशानी होने लगी है, ये लोग देश की सेना से जुड़ी सफलताओं को भी धार्मिक नज़रिए से देखने लगे हैं .

हो सकता है कि आने वाले वक्त में ऐसे लोग ये भी पूछने लगें कि बालाकोट एयरस्ट्राइक में शामिल वायुसैनिकों का धर्म क्या था, स्ट्राइक में शामिल कितने सैनिक..हिंदू थे, कितने मुसलमान थे, कितने सिख थे या कितने ईसाई थे  ? ये लोग हर बात का धार्मिक BreakUp मांगने लगते हैं . हर चीज़ को धर्म से जोड़ देते हैं...क्योंकि यही विचारधारा इनकी राजनीति का आधार है और धार्मिक बंटवारे के नाम पर ही इनकी दुकानदारी चलती है.

लेकिन ये लोग तब धार्मिक Beakup नहीं मांगते..जब हमारी सेना बाढ़ में फंसे लोगों की जान बचाती है . प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोगों की रक्षा करती है . ये लोग अपनी सुरक्षा में लगे जवानों का भी धार्मिक Breakup नहीं मांगते . ये लोग सेना को धर्म के साथ सिर्फ अपने फायदे के लिए जोड़ते हैं और अपनी राजनीति को चमकाने की कोशिश करते हैं .

इन्हीं नेताओं के सहयोग की वजह से टुकड़े टुकड़े गैंग आतंकवादी अफज़ल गुरु के समर्थन में नारे लगाने की हिम्मत कर पाता है. इन्हीं लोगों के समर्थन की आड़ में देश के टुकड़े टुकड़े करने के नारे लगाए जाते हैं . ये लोग एक आतंकवादी की फांसी रोकने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवा लेते हैं . ये सब देश के अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने के नाम पर किया जाता है.

लेकिन तब इन्हें इसमें तुष्टिकरण और सांप्रदायिकता दिखाई नहीं देती . इन्हें देश के लोगों को डराने और बांटने में आनंद आता है. लेकिन देश की सेना सर्वधर्म समभाव की नीति का पालन करती है .यानी वो सभी धर्मों को एक ही दृष्टि से देखती है और सभी धर्मों का सम्मान करती है. 3 सितंबर 2019 को जब Fighter Helicopter अपाचे को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था तब सभी प्रमुख धर्मों के प्रतिनिधियों ने इसकी पूजा की थी .

इनमें पंडित, मौलवी, ग्रंथी और पादरी शामिल थे . इसी तरह 25 मार्च 2019 को जब Multirole Helicopter शिनूक को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था...तब भी सभी प्रमुख धर्मों के विधि विधानों का पालन किया गया था और इसके बाद ही शिनूक भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ. इसी तरह जुलाई 2016 में तेजस को वायुसेना में शामिल किए जाने के समय भी सभी धर्मों के प्रतिनिधि वहां मौजूद थे.

फरवरी 2019 में जब  देश के सैनिकों को समर्पित पहले War Memorial का उद्घाटन किया गया था..तब भी हिंदू, सिख, मुस्लिम और ईसाई धर्म के प्रतिनिधियों ने अपने अपने तरीको से...पूजा अर्चना और इबादत की थी. यानी भारतीय सेना कभी किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेती और सेना के अस्त्र और शस्त्र सबसे ज्यादा धर्मनिरपेक्ष हैं .

देश की रक्षा करना भारतीय सेना का परम धर्म है और देश का हर जाबांज़ सैनिक इस धर्म का पूरी निष्ठा के साथ पालन करता है . भारत में रहने वाले कुछ लोगों को रफाल की शस्त्र पूजा से परेशानी हो रही है. लेकिन फ्रांस में रहने वाले भारतीय मूल के लोग इससे बहुत खुश हैं. हमने इस बारे में फ्रांस में रहने वाले भारतीयों से बात की...

उन्होंने इस पर क्या कहा आज आपको भी ये सुनना चाहिए . आपको ये बात जानकर आशचर्य होगा कि संविधान की मूल प्रति में हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के चित्र अंकित किए गए थे . इनमें भगवान बुद्ध, महावीर और दूसरे महान स्त्री और पुरुषों के भी चित्र थे . इन्हें मशहूर पेंटर नंद लाल बोस ने बनाया था .

यानी हिंदू धर्म और इसकी शाखाओं को संविधान में भी जगह दी गई थी . ये इसलिए किया गया था क्योंकि हिंदू धर्म की मूल आत्मा धर्मनिरपेक्ष है . हिंदू धर्म दुनिया का सबसे समावेशी धर्म है. जो दूसरों से नफरत नहीं..बल्कि प्यार करना सिखाता है . इस विषय पर आपको देश के कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद का एक पुराना बयान भी सुनना चाहिए .

जिसमें वो संविधान की मूल भावना का जिक्र कर रहे हैं. वर्ष 1971 में जब भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके...बांग्लादेश को आज़ादी दिलाई थी . तब Field Marshal..Sam Manekshaw थलसेना प्रमुख थे . जबकि उस युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका Eastern Command के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल Jack Farj Rafael Jacob यानी JFR जैकब ने निभाई थी जबकि लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने पाकिस्तान की सेना के जनरल नियाज़ी को 90 हज़ार सैनिकों के साथ आत्म समर्पण करने पर मजबूर कर दिया था .

Manekshaw एक पारसी थे...J.F.R जैकब एक यहूदी थे और उनके नाम में रफाल भी आता था . जबकि लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा एक सिख थे . यानी भारत के युद्ध इतिहास की सबसे बड़ी जीत के सबसे बड़े नायक अल्पसंख्यक समाज से थे .लेकिन इनमें से कभी किसी ने धर्म को लेकर कोई बयानबाज़ी नहीं की.

..और किसी राजनेता को भी ऐसा नहीं करने दिया . ये भारतीय सेना की वो विशेषता है जिस पर पूरे देश को गर्व है. क्योंकि हमारे देश की सेना के लिए धर्म सबको जोड़ने वाले कड़ी है... बांटने वाला हथियार नहीं .हमारे देश में करीब 80 प्रतिशत हिंदू हैं 14 प्रतिशत मुस्लिम हैं . 1.72 प्रतिशत सिख और ढाई प्रतिशत ईसाई हैं . जबकि पारसियों की संख्या सिर्फ 60 हज़ार के करीब  है .

लेकिन इनमें से किसी ने भी रफाल की शस्त्र पूजा पर आपत्ति नहीं की...जबकि नेता इस पर राजनीति करके...अल्पसंख्यकों को डराने की कोशिश कर रहे हैं . और इन लोगों का उद्देश्य एक धर्म विशेष के लोगों के मन में डर पैदा करना है .कांग्रेस जैसी पार्टियां धर्म का इस्तेमाल अपने वोट बैंक के हिसाब से करती रही हैं .

राहुल गांधी को जब हिंदुओं के वोटों की ज़रूरत होती है..तो वो जनेऊ पहन लेते हैं. अपना गोत्र लोगों को बताने लगते हैं. मानसरोवर की यात्रा पर चले जाते हैं और मंदिरों के चक्कर भी लगाते हैं .राहुल गांधी देश के भावी प्रधानमंत्री के तौर पर चुनाव प्रचार करते हैं . लेकिन तब उनकी और उनकी पार्टी की धर्मनिरपेक्षता गायब हो जाती है .

वो सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चलने लगते हैं . कांग्रेस के कार्यकर्ता पोस्टरों में उनकी तुलना भगवान तक से कर देते हैं ..लेकिन तब किसी को भी सांप्रदायिकता का डर नहीं सताता . क्योंकि नेताओं के लिए सत्ता से बड़ा कोई धर्म नहीं है और कुर्सी से बड़ा कोई भगवान नहीं है.ऐसे में ये नेता मंदिर और मस्जिद का इस्तेमाल सिर्फ वोटरों को लुभाने के लिए करते हैं और तब इन्हें धार्मिक चिन्हों के प्रदर्शन की चिंता नहीं सताती.

अब हम देश की सांस्कृतिक पहचान का विरोध करने वालों का थोडा सा और ज्ञानवर्धन करेंगे. ओम जैसे चिन्हों को पिछड़ेपन की निशानी समझने वाले नेताओं, अंग्रेज़ी बोलने वाले सेलिब्रिटिज़ और डिजाइनर पत्रकारों को दुनिया की सबसे बड़ी वैज्ञानिक प्रयोगशाला CERN की यात्रा करनी चाह ये स्विटज़रलैंड के जिनेवा शहर में है .

अगर ये लोग इस यात्रा पर जाएंगे तो इन्हें CERN के कैंपस में भगवान शिव के नटराज रूप की एक प्रतिमा दिखाई देगी. नटराज शिव का नृत्य करता हुआ रूप है. और माना जाता है कि जब शिव नटराज के रूप में तांडव करते हैं तो सृष्टि का निर्माण भी होता है और संहार भी. CERN में 100 से ज्यादा देशों और 600 से ज्यादा संस्थानों के वैज्ञानिक काम करते हैं और इनमें से किसी को भी हिंदू धर्म के इस प्रतीक से कोई परेशानी नहीं हैं.


(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from Zee News.)